लेखकः डॉ अब्बास महदी हसनी
हौज़ा न्यूज़ एजेंसी ! सय्यद उश शोहदा हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शहादत का वाकया इंसानी इतिहास का सबसे दर्दनाक अध्याय है। आपने और आपके रिश्तेदारों तथा सच्चे साथियों ने सच्चाई और इंसाफ़ की रक्षा करने तथा जेहालत और ज़ुल्म के खिलाफ़ उठ खड़े होने में अपनी अनमोल जानें क़ुर्बान कर दीं। इस महान क़ुर्बानी को हमेशा ज़िंदा रखने और इसके संदेश को हर जगह फैलाने का सबसे अच्छा ज़रिया है अज़ादारी (शोक मनाना) है पिछले चौदह सौ सालों में अज़ादारी के तरीक़े बदलते रहे हैं, लेकिन बुनियादी नियम वही हैं जो पैगंबर मुहम्मद (स.अ.व.) और उनके अहल-ए-बैत (पवित्र परिवार) ने अपनी कथनी और करनी से सिखाए हैं।
अज़ादारी सिर्फ़ रोना-धोना, मातम करना, सीना पीटना या नौहा (शोकगीत) पढ़ना ही नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी गहरी और अर्थपूर्ण मुहिम है जो इंसान के अंदर हर तरह से जागरूकता पैदा करती है। अहल-ए-बैत ने अज़ादारी को इमाम हुसैन के संदेश को ज़िंदा रखने की धुरी बनाया और उन्होंने खुद भी व्यावहारिक रूप से इसको फैलाया।
इमामों (अ.स.) ने विभिन्न तरीक़ों से हुसैन की अज़ादारी की, जिनमें ये काम मुख्य हैं:
✅ कर्बला की घटना को याद करना और लोगों को उसकी याद दिलाना।
✅ कर्बला वालों के दुखों पर रोना और दूसरों को भी रुलाना या सोग का माहौल बनाना।
✅ मजलिस' मर्सिया, नौहा(शोकगीत)सुनना और पढ़ना।
✅ मजलिसें(ग़म की सभाएँ) रखना और अहल-ए-बैत के दुखों को बयान करना।
✅ मुहर्रम के महीने में, खासकर आशूरा (दसवीं मुहर्रम) के दिन, ग़म और शोक का इज़हार करना।
मासूम इमामों की जीवन शैली में अज़ादारी का तरीक़ा: चौथे इमाम
सज्जाद (अ.स.) जब भी इमाम हुसैन को याद करते तो इतना रोते कि उनकी मुबारक दाढ़ी आँसुओं से तर हो जाती इसके अलावा उन्होंने दुआओं के ज़रिए कर्बला का पैग़ाम लोगों तक पहुँचाया। अज़ादारी का जो सही तरीक़ा है, उसकी नींव खुद इमामों ने रखी है।
इमामों के अनुसार अज़ादारी सिर्फ भावनात्मक रस्म नहीं, बल्कि एक बड़ी नेमत और सवाब का ज़रिया है:
• इमाम रज़ा (अ.स.) ने अपने एक साथी(सहाबी) से कहा: "अगर तुम हुसैन के लिए इतना रोओ कि तुम्हारे आँसू तुम्हारे गालों से बह जाएँ, तो खुदा तुम्हारे सारे गुनाह माफ कर देगा, चाहे वह गुनाह कम हों या ज़्यादा।"
• इमामों की नज़र में अज़ादारी का एक और बड़ा फ़ायदा यह है कि यह मोमिन (ईमान वाले) को अल्लाह और उसके रसूल के करीब करती है।
इससे साफ़ होता है कि अज़ादारी को रोकने या इसे बेमकसद कहने वाले विचार बेबुनियाद हैं, क्योंकि इसकी तरग़ीब (प्रेरणा) खुद रसूल और अहल-ए-बैत ने दी है।
🪴 अज़ादारी के कुछ ज़रूरी आदाब (तौर-तरीक़े):
जिस तरह दूसरे धार्मिक कार्यों के आदाब होते हैं, उसी तरह हुसैन की अज़ादारी के भी कुछ आदाब हैं जो इसकी खूबी और असर को बढ़ाते हैं:
अ. मजलिसों(शोक सभाओं) में अहल-ए-बैत की शिक्षाओं को उभारा जाए – भाषण देने वालों और शोकगीत पढ़ने वालों का काम सिर्फ रुलाना नहीं, बल्कि लोगों की समझ और विवेक में इज़ाफा करना हो।
ब. बातों और शायरी (कविताओं) का मैटर ऐसा हो जो शोक मनाने वालों को "ज़माने के यज़ीद" (अपने समय के ज़ालिम) की पहचान कराए और उन्हें उस समय के "हुसैन" (मौजूदा इमाम) की मदद करने के लिए प्रोत्साहित करे।
ज. काला कपड़ा पहनना: फिक़्ह (धर्म-विधान) के नज़रिके से अमूमन काला पहनना मकरूह है, लेकिन इमाम हुसैन और दूसरे इमामों की अज़ादारी के दिनों में इसे जायज़ और पसंदीदा समझा गया है।
द. ताज़ियत(सहानुभूति) प्रकट करना: अज़ादारी के दिनों में एक-दूसरे को "अज़्ज़मल्लाहु उजूरकुम" (अल्लाह आपका सवाब बढ़ाए) कहना भी अहल-ए-बैत की सुन्नतों में शामिल है।
अहल-ए-बैत के कथनों और कार्यों के अनुसार, इमाम हुसैन की अज़ादारी एक इबादत और अल्लाह का निशानी है। इसके तरीक़े और आदाब मासूम इमामों की तरफ से तय किए गए हैं, जिनमें रोना-धोना, शोक सभाएँ रखना, काला कपड़ा पहनना और सबसे बढ़कर – इन सभाओं को शिक्षा-दीक्षा और समझ-बूझ बढ़ाने का ज़रिया बनाना शामिल है।
इन तरीक़ों को अपना कर हम न सिर्फ अपने मोला सैयदुश्शुहदा से मोहब्बत के तकाज़े पूरे कर सकते हैं, बल्कि आपकी क्रांति और उसके महान संदेश को हमेशा बाक़ी रख सकते हैं।
इमामों के बताए तरीक़ों से (जिनको बर हक़ मराजए केराम ने भी फैलाया) शोक मनाना ही असली अज़ादारी कहलाएगी। इससे हटकर होने वाली अज़ादारी केवल भावुकता भरी तो हो सकती है, लेकिन असल और वांछित (मतलूबा) अज़ादारी नहीं हो सकती।
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